
‘ब्रज का संविधान’ है बृज भक्ति विलास
विवेक दत्त मथुरिया
नारायण भट्ट जी द्वारा रचित ‘ब्रज भक्ति विलास’ मात्र एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह ब्रजमंडल का वह प्रामाणिक दस्तावेज़ है जिसे विद्वान और संत ‘ब्रज का संविधान’ कहकर पुकारते हैं। यदि यह ग्रंथ न होता, तो आज ब्रज के अधिकांश तीर्थ, वन और सरोवर केवल कथाओं में सिमट कर रह जाते। यहाँ इस ग्रंथ की उन विशेषताओं का विवरण है जो इसे असाधारण बनाती हैं:
लुप्त तीर्थों का पुनरुद्धार (Geographical Restoration)
मध्यकाल के आक्रमणों और समय के प्रभाव से ब्रज की भौगोलिक पहचान खो चुकी थी। नारायण भट्ट जी ने इस ग्रंथ में श्रीमद्भागवत, पुराणों और संहिताओं के प्रमाणों के आधार पर ब्रज के 12 वन, 24 उपवन, और सैंकड़ों कुंडों की सटीक स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने ही पहचाना कि कौन सी पहाड़ी का क्या नाम है और कौन सा सरोवर ‘राधा कुंड’ है।
चौरासी कोस की परिक्रमा का विधान
आज लाखों श्रद्धालु जो 84 कोस की ब्रज यात्रा करते हैं, उसका पूरा शास्त्रोक्त मार्ग और नियम ‘ब्रज भक्ति विलास’ की ही देन है।
इसमें बताया गया है कि किस दिन किस स्थान पर विश्राम करना है।
किस कुंड में स्नान करने का क्या आध्यात्मिक महत्व है।
किस वृक्ष या पर्वत की वंदना किस मंत्र से करनी है।
ब्रज की सांस्कृतिक आचार संहिता
इस ग्रंथ को ‘संविधान’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह ब्रज में रहने और यहाँ आने वाले भक्तों के लिए नियम तय करता है:
ब्रजवास का महत्व: ब्रज में कैसे रहें, यहाँ के रज (धूल) का सम्मान कैसे करें।
मर्यादा: तीर्थों की पवित्रता बनाए रखने के निर्देश।
उत्सव पद्धति: ब्रज के प्रमुख त्योहारों (जैसे होली, झूला, अन्नकूट) को मनाने की शास्त्रीय विधि।
साहित्यिक और शोधपरक मूल्य
नारायण भट्ट जी ने इस ग्रंथ को संस्कृत में रचा और इसमें पद्म पुराण, स्कंद पुराण और आदि पुराण के संदर्भों का मेल किया। यह ग्रंथ एक शोध पत्र की तरह है जो यह सिद्ध करता है कि ब्रज का हर पत्थर भगवान कृष्ण की लीलाओं का गवाह है।
समन्वय की शक्ति
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने ब्रज के विभिन्न संप्रदायों (गौड़ीय, निम्बार्क, वल्लभ आदि) के बीच एक सर्वमान्य भौगोलिक आधार तैयार किया। सभी संप्रदाय ब्रज की सीमाओं और तीर्थों के निर्धारण के लिए ‘ब्रज भक्ति विलास’ को ही अंतिम प्रमाण मानते हैं।


