
बरसाना में ज्येष्ठ मास के दशहरे को उड़ाई जाती हैं पतंगें
बरसाना(ब्रज ब्रेकिंग न्यूज)। टीवी, मोबाइल और इंटरनेट के दौर में मनुष्य के मनोरंजन के साधनों में बदलाव आया है और इसी वजह से पुराने समय के कई शौक अब खत्म होने के कगार पर हैं। पतंगबाजी पुराने वक्त के लोगों का प्रिय खेल हुआ करती थी पर बदलते समय में पतंग उड़ाने और पेच लड़ाने का चलन दिनोदिन घटता जा रहा है।
देश में कहीं मकर संक्रांति तो कहीं 15 अगस्त को पतंग उड़ाई जाती हैं पर राधा रानी की नगरी बरसाना में पतंगबाजी का अवसर होता है ज्येष्ठ मास का दशहरा। आज से कोई दो दशक पहले तक कस्बे में पतंग उड़ाने को लेकर बड़ा उत्साह देखने को मिलता था। दशहरे से एक महीना पहले से ही आसमान में पतंग उड़ाना शुरू हो जाता था। बच्चे, बूढ़े और जवान सब पतंगबाजी का आनंद उठाया करते थे। दशहरे की शाम को तो सारा आसमान पतंगों से भरा दिखता था। वहीं गलियों में कटी हुई पतंगे लूटने वाले बच्चों की टोलियां दौड़ती दिखाई देती थीं। लेकिन वर्तमान दौर में इसे लेकर कोई उत्साह नजर नहीं आता है। कुछेक लोग ही हैं जो पतंग उड़ाते दिखते हैं।
पहले जहां गर्मियां शुरू होते ही पतंग की दर्जनों दुकानें खुल जाती थीं अब मात्र एक दो जगहों पर ही पतंग और डोर बेची जाती है। कुछ असर महंगाई का भी हुआ है। पहले जहां सबसे महंगी पतंग पांच रुपए की हुआ करती थी अब सबसे सस्ती पतंग पांच रुपए में आती है। पहले जहां तीस चालीस रुपए में हजारा डोर आ जाती थी अब वो भी सौ से दो सौ तक मिलती है।
लोगों में पतंगबाजी के प्रति घटते उत्साह के बारे में कस्बा निवासी हरिओम शंकरा कहते हैं कि पहले के समय से लोगों के पास गर्मियों के दिनों में खाली समय हुआ करता था आजकल पुरानी पीढ़ी के लोग काम में व्यस्त हैं और नई पीढ़ी के लोग मोबाइल में व्यस्त हो गए हैं।
रवि गोस्वामी का मानना है कि आजकल के एजुकेशन सिस्टम में स्कूल वाले बच्चों को इतना व्यस्त कर देते हैं कि उनके पास समय ही कम बचता है। इसीलिए पतंगबाजी ही नहीं दूसरे कई आउटडोर खेल भी भुला दिए गए हैं।
सभासद प्रतिनिधि विवेक अग्रवाल का मानना है कि जब से चाइनीज मांझा आया है तब से पतंग उड़ाने में खतरा बढ़ गया है इसलिए लोग अपने बच्चों को पतंग उड़ाने से रोकते हैं।
दीपू पंडित बताते हैं पहले के दिनों में पतंग उड़ाने से ज्यादा उत्साह कटी हुई पतंग लूटने का हुआ करता था।





