
(संत गणेश दास बाबा)
(स्मृति)
विवेक दत्त मथुरिया
कहने को कुछ भी कहो पर यह भी सत्य है कि ब्रज में भक्ति के नाम पर एक बड़ा बाजार देखा जा सकता है। दर्शन, परिक्रमा, भोग भंडारे, दान के नाम पर संत, साधु, बाबा लोगों का प्रचार प्रसार (विज्ञापन) पर बहुत जोर रहता है। यह भक्ति नहीं, भक्ति के नाम पर चराचर माया का प्रभाव माना जायेगा। चराचर माया के बीच ब्रज में सच्चे विरक्त संत भी ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ’ की शर्त के साथ मिल जाते हैं।ऐसे ही एक सच्चे प्रामाणिक संत के रूप में बरसाना में तकरीबन साठ साल वास करने वाले अवधूत बाबा गणेश दास का नाम शीर्ष पर आता है।
बाबा के बारे में ललिता पीठाधीश्वर गोस्वामी कृष्णानंद भट्ट बताते हैं कि बाबा गणेश दास बिहार के मिथलांचल के रहने वाले थे और सेना की नौकरी छोड़ने के बाद उनका ब्रज आगमन हुआ और ऊंचागांव में बाबा महाराज ब्रजाचार्य हरिगोपाल भट्ट जी से दीक्षा लेने के बाद फिर ब्रज बरसाना के होकर रह गए। बाबा गणेश दास की स्मृतियां बरसानावासियों के ह्रदय में छाई हुई हैं। 14 अक्टूबर 2014 में अपनी नश्वर देह को त्याग दी।
कहते हैं कि न जाने कितने रूपों में माया और मायापति गणेश दास बाबा के पास आये लेकिन उनकी साधना से किंचित भी विचलित नहीं कर सके। ब्रज और लाडली जी के प्रति उनकी अनन्यता उनकी विरक्ति से स्वत: सिद्ध रही।
बाबा गणेश दास ब्रजाचार्य बाबाश्री हरिगोपाल भट्ट जी के परम कृपा पात्र शिष्य के रूप में ब्रज की संत विभूतियों में सही मायने में चौबीस कैरट एकदम खरे सोने जैसे सच्चे विरक्त संत रहे। पूरी तरह से निसंग। न कोई शिष्य न एक इंच जमीन। कुल जमा संपति के नाम पर दो तांबे की लुटिया, एक छोटे से झोला में दो डमरू, दो लगोंट और एक ब्रज के किसी वृक्ष का टेढ़ा सा डंडा। एक छाक की पांच घरों की मधुकरी वह भी विशुद्ध करपात्री रुप में। जब भी बाबा मधुकरी किया करते थे तो भैरों के गण भी साथ होते थे। बाबा आधी रोटी खुद पाते और आधी भैरों के गण को दे देते थे।
बाबा गणेश दास ने ताजिंदगी एक किनका भी किसी भंडारे में नहीं खाया। न जाने कितने कुबेर (धनपति) उनकी सेवा के लिए बाबा की स्वीकृति का इंतजार कर थक हारकर खाली हाथ वापस हो गए।
बाबा गणेश दास की यह फक्कड और अक्खड़ता संत दादू की इस उक्ति को चरितार्थ करती है –
दादू दावा मत करै, बिन दावे दिन काट।
कितने ही सौदा कर गये, ये सौदागर की हाट।
प्रति दिन मध्यान्ह में बेनागा विजया (भांग) प्रसाद, शाम को गहवर वन की परिक्रमा और लाडली जी की नित्य संध्या आरती के दर्शन। अर्ध रात्रि के बाद साढ़े तीन बजे की दोनों हाथों से डमरु के साथ रासपंचाध्यायी का पाठ। गणेश दास बाबा निसंग, अवधूत रूप में रसिक संत थे। ब्रज का गूढ़ रसिक साहित्य उनको कंठस्थ था। जिसे उनके मुख से सुनना दुर्लभ ही था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाबा गणेश दास पर अपने गुरु ब्रजाचार्य बाबा महाराज हरिगोपाल भट्ट जी की अहैतुकी कृपा रही। बाबा गणेश दास ने अपने गुरु की जो सेवा की वह भी दुर्लभ साधना रही। बाबा गणेश दास के परमस्नेही और ब्रजाचार्य पीठ के प्रवक्ता गोस्वामी घनश्याम राज भट्ट बताते हैं कि बाबा ने ब्रज में कहीं कोई आश्रम नहीं बनाया और न ही कोई शिष्य। ब्रज में शेष जीवन ऊंचागांव दाऊजी मंदिर में गुरु और गुरु परिवार की सेवा में कुछ समय राजस्थान के नीमराना में प्रवास किया। उसके बाद बरसाना में अपने स्नेही मित्र ब्रज मोहन वैद्यजी के कमरे पर रह कर छाना घोटी हुई और उसके बाद अपने परम स्नेही शंभू पंडा के प्रियाकुण्ड के नजदीक प्लाट पर गोलोक गमन तक रहे। बाबा गणेश दास के फक्कड़पन से हर कोई वाकिफ रहा।
बाबा गणेश दास ब्रज के सच्चे साधक थे। संसार मे रहते हुए संसार को अपने अंदर प्रवेश नहीं करने दिया ठीक उसी प्रकार जैसे नाव पानी मे रहती है और पानी को अपने अंदर प्रवेश नहीं करने दे। बाबा गणेश दास की मस्ती और हस्ती इस कहावत को चरितार्थ करती है-जिसने ये ऐलान किया है वो मजे में,या वो फकीर है या फिर नशे में हैं।