
जन्माभिषेक के बाद पीले रंग की जड़ित पोषक धारण करेंगी लाडली जु
वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ होंगे मूल शांत
विवेक अग्रवाल ” विक्की”
बरसाना। कहा जाता है कि राधाजी का जन्म श्री कृष्ण से प्रेम भाव को मजबूत करने के लिए हुआ था । एक प्राण दो देह कहे जाने वाले राधा कृष्ण की भूमि मथुरा राधा के जन्मोत्सव पर राधा के रंग में रंगी नजर आ रही है, चारों तरफ रोशनी ही रोशनी, भक्तों ने श्रीजी के स्वागत की पूरी तैयारी कर ली है। राधा की नगरी में ब्रज की अधिष्ठात्री देवी और श्रीकृष्ण की आल्हादिनी शक्ति वृषभानुसुता श्री राधिका रानी के जन्म के अवसर पर उनकी एक झलक पाने को देश दुनिया के कौने-कौने से श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं। राधा रानी की जय, महारानी की जय के जयकारों से लाडलीजी मंदिर प्रांगण गुंजायमान हो रहा है।

अपनी आराध्या की एक झलक पाने व उनके जन्मोत्सव के पलों का साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु शुक्रवार से ही बरसाना पहुंचने लगे थे। सूर्य की तपिश भी श्रद्धालुओं की आस्था के आगे कमजोर नज़र आई। शाम को थोड़ी देर के लिए इंद्रदेव मेहरबान नजर आए। शुक्रवार की शाम तक तो श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। रविवार की सुबह करीब चार बजे होने वाले अभिषेक के दर्शनों का साक्षी बनने के लिए श्रद्धालु बरसाना पहुंचते रहे। कस्बे के बाहर तीन से पांच किमी दूर तक बनी हुई पार्किंगों में अपने वाहन छोड़ पैदल चलने को तैयार श्रद्धालुओं की चाहत और आस्था देखते ही बन रही है। अपनी लाडो के जन्म का उत्सव मनाने को हर कोई आतुर दिखाई पड़ रहा है।

श्रीकृष्ण की प्रियतमा राधिका के जन्म आगमन पर चारों तरफ बस राधा रानी के भक्त ही भक्त नज़र आ रहे है। हर कोई राधा कृष्ण की भक्ति में डूबा नज़र आ रहा। गहवरवन की लताओं पताओं से होकर परिक्रमा करते भक्त द्वापरकालीन लीलाओं में भाव विभोर नजर आए। परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले हर मंदिर के दर्शन करते हुए भक्तजन राधे राधे जप रहे थे। रात्रि में मंदिर में जुगल जोड़ी सरकार के शयन के बाद पूरे कस्बे में जगह जगह भजन संध्याओं के आयोजन होते है जिसमे श्रद्धालु थिरकते रहते है और राधा नाम पर नाचते झूमते हैं। सुबह चार बजे तक यह कार्यक्रम चलता है। अभिषेक के समय तक श्रद्धालु राधे की मस्ती में मदमस्त होकर झूमते नाचते हैं।

मन्दिर पर सेवायतों द्वारा दूध, दही, शहद, घी, बूरा, केसर, गुलाब जल, गोघृत आदि का पंचामृत बना कर अभिषेक कराया जाता है। चूंकि राधाजी का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था, इसलिए 27 कुओं के जल, 27 पेड़ों की पत्ती, 27 स्थान की मिट्टी, औषधियों के साथ परंपरागत मंत्रोच्चार के मध्य गर्भ गृह के अंदर सेवायत गोस्वामीजनों के द्वारा रात्रि दो बजे से चार बजे तक मूल शांति कराए जाते है। मूल शांति की विधि के बाद लाड़लीजी के अभिषेक की विधि विधान से शुरुआत होगी जो करीब सवा घंटे तक चलेगा। अभिषेक के बाद श्रृंगार आरती पर जब भक्तों के लिए आराध्य का पर्दा खुलेगा तो राधा रानी अपने भक्तों को पीले रंग की स्वर्ण और हीरे से जड़ित पोशाक में दर्शन देंगी।
