
बरसाना(ब्रज ब्रेकिंग न्यूज)। आज के समय पर जहां राधारानी के जन्मोत्सव के मौके पर बरसाना की छटा इस तरह सुशोभित हो रही है कि इंद्र का ऐश्वर्य भी इसके सामने फीका नजर आए। साफ स्वच्छ रास्ते, रोशनी से जगमगाता गांव, हाथरस की मशहूर सजावट, देश दुनिया से आए लाखों श्रद्धालु और उनकी व्यवस्थाओं में जुटे हजारों सरकारी कर्मचारी। पर क्या हमेशा से ऐसा ही होता आया है। आज से ढाई सौ साल पहले कैसा होता होगा यह सब। किस तरह मनाई जाती रही होगी राधाष्टमी।

बरसाना के रहने वाले इतिहासकार योगेंद्र सिंह छौंकर से बताते हैं कि राधाष्टमी का उत्सव ढाई सौ साल पहले किस तरह मनाया जाता था इसका वर्णन तत्कालीन कवि नागरीदास के ग्रंथ तीर्थानंद में मिलता है। नागरी दास लिखते हैं

श्रीराधा जन्मोत्सव वर्णन :
निस सप्तमिहीं बरसानै जाय, तहां सुख ढाढ़ी देख्यो सु आय।
वृषभानु राय कौ पढ़त वंश, जो ब्रह्मादिक कृत मुख प्रसंस।
जहां बरीसान पर्वत निवास, तहां धवल नवल उज्जल अवास।
फहरात धुजा कलसनि उतंग, ठहरात नहीं लगि पवन संग।
घहरात हैं ता पर घटा आनि, लहरात इतैं बाजत निसानि।
जब भयो अष्टमी द्योस प्रात। श्रीराधा जनम उछाह गात।
अति मंगलधुनि पुर गइय पूर, बजि उठे भेर सहनाय तूर।
झंझनत झांझ नौबतनि घोष, प्रति शब्द गयो पुर जहां मोष।
सब गावत नाचत भरे हैं रंग, आवत अप अपनी चाव संग।
इक उतरत अरु इक चढ़त प्रात, गिरि गैल भीर निकस्यो न जात।
दधिकांदौ माची बढ्यो सुखेलि, बह चली जहां तहां घरनि रेलि।
सब हरद दही भीजै लसन्त, जनु फूल्यो भादौं में बसंत।
लयो दृगनि श्रवण सुख सबनि भोग, गावत खेलत मिली चले हैं लोग।
उतरैं गिरतैं छवि देत झुंड, सब गये न्हान वृषभानु कुंड।
दोहा :एहि विधि राधा अष्टमी, जिहिं लीनो सुख सार।
ताहि न कछु करिबो रह्यो, यह जानौ निरधार।।

सप्तमी की रात को राधारानी के मंदिर में ढाढ़ी आकर वृषभानु जी के वंश का बखान करते हुए उनकी वंशावली गाकर राधारानी के जन्म की बधाई देता है। बरसाना में पर्वत के ऊपर धवल यानी श्वेत रंग का आवास है, जो उस समय का मंदिर था। मंदिर के ऊपर कलश लगे हैं और ध्वजा लहरा रही है। आसमान में घटाए छा रही हैं और बाजे बज रहे हैं।

अष्टमी की सुबह राधारानी के जन्म का उल्लास उत्साह दिखता है। मंगल ध्वनि बजती है, शहनाई, झांझ नौबत आदि के वादन से पूरा नगर गूंज उठता है। सब खुशी से नाचते गाते हैं और अपनी चाव लेकर चढ़ाने आते हैं। मंदिर में आने और जाने वालों की भीड़ के कारण पहाड़ी का रास्ता भर गया है और लोगों का निकलना मुश्किल हो रहा है। इसके बाद दधिकांदा का आयोजन होता है दही और हल्दी से सबके वस्त्र पीले हो जाते हैं ऐसे लगता है मानो भादों में बसंत आ गया हो। इसके बाद मंदिर से उतर कर सभी लोग वृषभानु कुंड में जाकर स्नान करते हैं।

उपरोक्त वर्णन श्रीनागरीदास जी ने अपने ग्रन्थ तीर्थानंद में किया है। 18वीं शताब्दी में बरसाना में राधाष्टमी का आयोजन किस तरह किया जाता था उसका आंखों देखा विवरण नागरीदास जी ने किया है। इसमें हम देख सकते हैं कि ढाढ़ी द्वारा वृषभानु जी की वंशावली का गायन भी बताया गया है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि ढाढ़ी लीला नागरीदासजी के समय पर (आज से करीब 250 वर्ष पूर्व) भी चलन में थी। इसमें दधिकांदा और उसके उपरांत वृषभानु कुंड स्नान का भी उल्लेख है जो परम्परा अब नहीं दिखती है। नागरीदासजी ने सफेद छतरी में श्रीजी के दर्शन कराने का वर्णन नहीं किया है उसकी वजह यह है कि उस समय तक इस सफेद छतरी का निर्माण नहीं हुआ था।
