
नंदगांव व बरसाना के मंदिरों की साझी समाज गायन की परंपरा
योगेंद्र सिंह छौंकर
बरसाना (ब्रज ब्रेकिंग न्यूज)। मंदिरों में गायन व संगीत की परंपरा बेहद पुरानी है। मध्यकाल में विविध संप्रदायों ने भोग के साथ राग सेवा भी अनिवार्य की। यह परंपरा आज भी तमाम देवालयों में यह परंपरा देखने को मिलती है। समय के साथ यह परिवर्तित और समृद्ध भी हुई। तमाम नए भक्त कवियों के रचे पड़ भी देवलयी गायन परम्परा में शामिल हुए। सोलहवीं सदी में ब्रज के हर देवालय में यह समाज गायन की परम्परा शुरू हुई। हर उत्सव पर उत्सव के संबंधित पदों का गायन देवालयों की परम्परा से जुड़े लोग करते रहे। पर बदलते वक्त के साथ कहीं पर तो यह लुप्त ही हो गई है और कहीं पर यह अत्यंत सूक्ष्म हो गई है। पर नंदगांव और बरसाना के मंदिर आज के दौर में भी न केवल इस परंपरा का नियमपूर्वक निर्वहन कर रहे हैं साथ ही अगली पीढ़ी भी इसे सीखने में पूरी रुचि ले रही है।

ब्रज के परिपेक्ष्य में अगर देखें तो बरसाना और नंदगांव में बने दो मंदिर ऐसे हैं जो न केवल राग साथ भी भाव के स्तर पर भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सिर्फ जुड़े हुए कहना पर्याप्त नहीं है, यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यह भी दिलचस्प है कि दोनों ही मन्दिर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा स्थापित किये गए गए।

पहला मन्दिर है नंदगांव का नंदराय मन्दिर जिसे पंद्रहवीं सदी में एक ब्रजवासी ब्राह्मण आनंदघन द्वारा स्थापित किया गया। इस मंदिर में नंदबाबा, यशोदा, कृष्ण, बलराम, राधारानी और दो सखाओं की मूर्तियां हैं। दूसरा मंदिर है बरसाना का लाडलीजी मन्दिर जिसमें राधारानी और कृष्ण के विग्रह विराजमान हैं। यह मंदिर सोलहवीं सदी में दाक्षिणात्य ब्राह्मण नारायण भट्ट द्वारा स्थापित किया गया था। काल गणना से बरसाना का मंदिर नंदगांव के मंदिर के बाद का है। पर बरसाना वाले मन्दिर के संस्थापक नारायण भट्ट की प्रेरणा से इन दोनों मंदिरों की एक साझा संस्कृति विकसित हुई और किसी एक खास सम्प्रदाय की परंपरा के अंतर्गत न होने पर भी ये दोनों मन्दिर एक की परंपरा से जुड़ गए।
नंदगांव का मंदिर कृष्ण का प्रतिनिधि देवालय हो गया और बरसाना का मंदिर राधारानी का प्रतिनिधित्व करने लगा। दोनों मंदिरों के सेवायत इस परंपरा को लेकर आगे बढ़े और आज तक इसे जीवंत बनाये हुए गए। एक मन्दिर राधा का घर है तो दूसरा कृष्ण का घर और राधा की ससुराल। दोनों ही मंदिरों की एक साझा राग परंपरा विकसित हुई। यहां दोनों मंदिरों के सेवायत आमने-सामने बैठकर संयुक्त समाज गायन करते हैं। यह संयुक्त समाज गायन खास अवसरों पर किया जाता है। अगर कृष्ण के जन्म का अवसर होगा तो बरसाना मन्दिर के गोस्वामीजन नंदगांव मन्दिर में पहुंचकर बधाई के पद गाते हैं और अगर मौका हो राधा के जन्म का तो नंदगांव मन्दिर के गोस्वामीजन बरसाना के मंदिर में आकर बधाई के पद गाते हैं। यह सिलसिला सिर्फ बधाई तक सीमित नहीं है। राधा और कृष्ण की लीलाएं जो वर्ष में तमाम अवसरों पर आयोजित होती हैं तब यह गोस्वामीजन आमने-सामने बैठकर पदों का गायन करते हैं। इन पदों में राधा-कृष्ण की विविध लीलाओं के गायन के साथ-साथ राधा पक्ष और कृष्ण पक्ष के मध्य का प्रेम, हंसी-मजाक, उपहास व अन्य तमाम दूसरे लक्षणों का समावेश दिखता है।
ब्रज के अन्य मंदिरों की तुलना में इन दोनों ही मंदिरों के बीच समाज गायन की यह परंपरा अभी भी बेहद उन्नत दशा में जीवंत है। होली के अवसर पर कुछ देवालय जहां महज एक या पांच दिन का ही समाज गायन होता है जबकि बरसाना और नंदगांव में यह चालीस दिन तक चलता है। बसंत पंचमी को आदि रसिक कवि जयदेव के ‘विहरति हरि रिह सरस् बसन्ते’ से शुरू होकर धुलेंडी के दिन ‘ढप धर दे यार गई परकी’ तक यह क्रम चलता ही रहता है। समाज गायन के इस क्रम में मध्यकाल के कवियों के साथ-साथ बाद के कवियों के पदों को भी स्थान दिया गया है। यहां यह बताना भी जरूरी है कि इस समाज गायन के लिए कोई वैतनिक व्यक्ति अधिकृत नहीं होता है। दोनों गांवों के गोस्वामीजनों का नेतृत्व उनके मुखिया जी करते हैं। अपने अपने मुखियाओं के नेतृत्व में बड़ी संख्या में समाजी इस परंपरा के वाहक बने हुए हैं।